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आयरलैंड ने जलवायु आपातकाल की घोषणा की


आयरलैंड की संसद ने 09 मई 2019 को जलवायु आपातकाल घोषित कर दिया है. आयरिश की संसद ने एक संसदीय रिपोर्ट में संशोधन की घोषणा की, जिसमें बिना किसी वोट के आपातकाल की घोषणा की गई थी.

संसदीय रिपोर्ट ने संसद से यह भी जांच करने का आह्वान किया कि कैसे आयरिश सरकार जैव विविधता हानि के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में सुधार कर सकती है। निर्णय पर्यावरण प्रचारकों द्वारा स्वागत किया गया था जिन्होंने इसे ऐतिहासिक बताया.

संसदीय रिपोर्ट में संसद से आह्वान किया गया कि कैसे आयरिश सरकार जैवविविधता को नुकसान के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में सुधार कर सकती है.  इस निर्णय को पर्यावरण प्रचारकों द्वारा स्वागत किया गया और उन्होंने इसे ऐतिहासिक बताया.

जलवायु आपातकाल की घोषणा करने वाला विश्व का दूसरा देश
आयरलैंड जलवायु आपातकाल की घोषणा करने वाला विश्व का दूसरा देश बना गया है. इससे पहले ब्रिटेन जलवायु आपातकाल घोषित करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है. ब्रिटेन की संसद ने 01 मई 2019 को जलवायु आपातकाल घोषित करने हेतु प्रस्ताव पारित किया था, जिससे वह जलवायु आपातकाल की घोषणा करने वाला विश्व का पहला देश बन गया था.

मुख्य बिंदु:

• ब्रिटेन ने जलवायु आपातकाल की घोषणा करने वाला विश्व का पहला देश बन गया. ब्रिटेन ने यह कदम लंदन में हुये आंदोलन के बाद उठाया था. एक्सटिंशन रिबेलियन इनवायरनमेंटल कैम्पेन समूह ने यह आंदोलन चलाया था.

• सरकार को यह ध्यान रखना होगा की आने वाला प्रत्येक नया वाहन बिजली या सौर ऊर्जा से चलने वाला हो.

• इस समूह का उद्देश्य साल 2025 तक हरित गैसों के उत्सर्जन की सीमा शून्य पर लाने और जैवविविधता के नुकसान को समाप्त करना है. इस पहल को वैश्चिक स्तर पर वाम झुकाव वाले दलों का समर्थन हासिल है.

• सरकार को कृषि आधारित नीतियों को मजबूत करना होगा जिससे ज्यादा से ज्यादा किसानों को प्रोत्साहन मिले. वन्य क्षेत्र में वृद्धि करना होगा जिससे की साल 2050 तक इसे 13 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत किया जा सके.

ग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?
ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में उपस्तिथि कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में सहयता करतीं हैं. इन ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाई आक्साइड, जल-वाष्प, मिथेन आदि गैस शामिल हैं. यदि ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो शायद ही धरती पर जीवन होता.  अगर ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो पृथ्वी का औसत तापमान -18° सेल्सियस होता न कि वर्तमान 15° सेल्सियस होता. धरती के वातावरण के तापमान को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं जिसमें से ग्रीनहाउस प्रभाव एक कारक है.

जलवायु परिवर्तन क्या है?

पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से साल दर साल बढ़ रहा है. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) की रिपोर्ट ने पहली बार इससे आगाह किया था. अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं. इसके दुष्परिणाम गर्मियां लंबी होती जा रही हैं, और सर्दियां छोटी. विश्वभर में ऐसा हो रहा है. प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति एवं प्रवृत्ति बढ़ चुकी है. ऐसा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण हो रहा है.

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) क्या है?

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) अन्तर सरकारी वैज्ञानिक निकाय है. यह संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक पैनल है. यह पैनल जलवायु में बदलाव एवं ग्रीनहाउस गैसों का ध्यान रखता है. इस पैनल को साल 2007 में शांति नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

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